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October to December 2025 Article ID: NSS9509 Impact Factor:8.05 Cite Score:110 Download: 13 DOI: https://doi.org/ View PDf
शोषण, संघर्ष और वंचित वर्ग: संजीव की कहानियों के संदर्भ में
नरेश कँवर भाटी
शोधार्थी, जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड-टू-बी विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)प्रो. मलय पानेरी
प्राचार्य, जनार्दन राय नागर राजस्थान विद्यापीठ डीम्ड- टू-बी विश्वविद्यालय, उदयपुर (राज.)
शोध
सारांश- भारतीय समाज का जो वर्तमान स्वरूप है उसका विकास
किसी निश्चित तिथि, दिन अथवा वर्ष में नही हुआ है अपितु समय के साथ-साथ उसका विकास
हुआ है। वर्तमान समाज में जाति, वर्ण, धर्म तथा गरीबी अथवा अमीरी के आधार पर विविध
वर्ग बनाये गये है। इनमें सबसे निचले हाशिये पर वंचित वर्ग है।
वंचित वर्ग समाज का वह हिस्सा है जो विभिन्न
कारणों जैसे गरीबी, भेदभाव, या अवसरों की कमी के कारण, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक
रूप से मुख्यधारा से अलग-थलग पड़ जाता है। इन वर्गों को अक्सर सामाजिक, आर्थिक, और
सांस्कृतिक रूप से पिछड़े हुए लोगों के रूप में देखा जाता है, जिन्हें समाज में समान
अवसर और संसाधन प्राप्त करने में कठिनाई होती है।
संजीव की रचनाधर्मिता सदैव नए विषयों की खोज
रही है, नई वैचारिक अभिव्यक्ति, संवेदना और सांस्कृतिक विघटन से टूट रहे समाज की पीड़ा
इनकी कहानियों के केंद्र में निहित है। संजीव की कहानियाँ वंचित समाज के अंदर चेतना
का संचार करने में सक्षम हैं।
संजीव जी की सदैव अपनी आवाज नारी, किसान, भिखारी,
गरीब, आदिवासी, दलित एवं शोषित के पक्ष में उठते रहे है। उन्होने पिछडे एवं वंचित वर्ग
की समस्याओं को समझकर ही उनके यथार्थ को बड़ी बारीकी एवं संवेदनशीलता के साथ अपनी कहानियों
में प्रस्तुत किया है।
संजीव जी की कहानियों में पीड़ित, शोषित एवं
वंचित वर्ग का यथार्थ चित्रण देखने को मिलता है जिसके अन्तर्गत श्रमिक, किसान, मजदूर
एवं नीचले तबके के लोग आते है। जिनकी समाज में स्थिति उनकी कम आय एवं शैक्षिक स्थिति
पर निर्भर करती है। इस शोधपत्र का उद्देश्य संजीव की कहानियों में वंचित वर्ग के शोषण
और संघर्ष के कारकों की पहचान कर उनकी स्थिति का आंकलन करना है।
शब्द कुंजी- वंचित वर्ग, किसान, भिखारी, गरीब, आदिवासी, दलित, शोषण
और संघर्ष, सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्थिति, संजीव जी, वैचारिक अभिव्यक्ति, संवेदना
और सांस्कृतिक विघटन।
