• October to December 2025 Article ID: NSS9512 Impact Factor:8.05 Cite Score:63 Download: 9 DOI: https://doi.org/ View PDf

    मैत्रेयी पुष्पा के संदर्भ में नारी

      दीपिका सेन
        शोधार्थी, महाराजा छत्रसाल बुंदेलखण्ड विश्वविद्यालय, छतरपुर (म.प्र.)
      डॉ. अवधेश जैन
        प्राध्यापक एंव विभागाध्यक्ष (हिन्दी) शासकीय कमला नेहरू महिला महाविद्यालय, दमोह (म.प्र.)

शोध सारांश-  मैत्रेयी पुष्पा समकलीन हिन्दी साहित्य की उन विरल स्त्री लेखिकाओं में अग्रणी हैं, जिन्होने नारी-विमर्श को केवल वैचारिक या सैद्धांतिक धरातल तक सीमित न रखकर उसे सामाजिक यथार्थ और जीवनानुभवों से जोड़ा हैं। उनका साहित्य स्त्री की आतंरिक पीड़ा, बाह्य संघर्ष, सामाजिक शोषण और आत्मचेतना का जीवंत दस्तावेज हैं। वे स्त्री को दया, करूणा या सहानुभूति की वस्तु के रूप में प्रस्तुत नहीं करती, बल्कि उसे एक सक्रिय जागरूक और निर्णयक्षम सत्ता के रूप में स्थापित करती हैं। इसी कारण मैत्रेयी पुष्पा का लेखन हिन्दी नारी-विमर्श में एक निर्णायक मोड़ प्रस्तुत करता हैं।

    मैत्रेयी पुष्पा के साहित्य में नारी-विमर्श का मूल आधार स्त्री-अस्मिता की खोज हैं। उनकी रचनाओं की स्त्रियाँ परंपरागत ढाँचों जैसे-विवाह, परिवार, सामजिक मर्यादा और नैतिकता को यथावत स्वीकार नहीं करती बल्कि उन पर प्रश्न उठाती हैं। स्त्री के लिए निर्धारित भूमिकाएँ उनके यहाँ स्थिर नहीं हैं, बल्कि परिवर्तनशील हैं।उनका लेखन स्त्री-देह को लेकर समाज में व्याप्त रूढ़ धारणाओं को भी तोड़ता हैं। मैत्रेयी पुष्पा स्त्री-देह को न तो पवित्रता के आदर्श में बाँधती हैं, और न ही उसे केवल भोग की वस्तु के रूप में देखती हैं। वे देह को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संदर्भो से जोड़कर प्रस्तुत करती हैं।

    मैत्रेयी पुष्पा पितृसत्तात्मक व्यवस्था की आलोचना करते हुए यह स्पष्ट करती है कि स्त्री-दमन केवल पुरूषों के कारण नहीं, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, परंपराओं और मूल्यों के कारण भी होता हैं। स्त्री कई बार स्वयं भी इन संरचनाओं का हिस्सा बनकर अपने दमन को अनजाने में स्वीकार लेती हैं। उनके साहित्य में स्त्री का संघर्ष केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी हैं वह अपने भीतर बैठे डर, संकोच और आत्महीनता से भी लड़ती हैं। यह आतंरिक संघर्ष उनके नारी-विमर्श को और अधिक गहन बनाता हैं।मैत्रेयी पुष्पा की स्त्रियाँ विद्रही है, किन्तु यह, विद्रोह केवल उग्र नारेबाजी नहीं हैं। यह जीवन की परिस्थितियों से उपजा स्वभाविक प्रतिरोध हैं। वे अपने श्रम, प्रेम, देह और निर्णयों पर अधिकार चाहती हैं।