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October to December 2025 Article ID: NSS9532 Impact Factor:8.05 Cite Score:322 Download: 24 DOI: https://doi.org/ View PDf
शिक्षक की बदलती भूमिका-समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण
डॉ. राजेश कुमार शुक्ला
सहायक आचार्य (समाजशास्त्र) श्री किशुन महाविद्यालय, खेजुरी, बलिया (उ.प्र.)
शोध सारांश- शिक्षा समाज के विकास का प्रमुख साधन है और शिक्षक इस प्रक्रिया का केंद्रीय आधार होता है। सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं तकनीकी परिवर्तनों ने शिक्षक की भूमिका को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। पारंपरिक समाज में शिक्षक को ज्ञानदाता और अनुशासनकर्ता के रूप में देखा जाता था, जबकि आधुनिक समाज में वह मार्गदर्शक, परामर्शदाता, समाज सुधारक और सामाजिक परिवर्तन के एजेंट के रूप में उभर कर सामने आया है। नवीन शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षक की भूमिका को और अधिक बहुआयामी बनाते हुए मूल्य आधारित शिक्षा, बहु-विषयक दृष्टिकोण और तकनीकी दक्षता पर बल दिया है। यह शोध पत्र समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से शिक्षक की बदलती भूमिका का विश्लेषण प्रस्तुत करता है और यह स्पष्ट करता है कि शिक्षक समाज और शिक्षा के बीच सेतु का कार्य करता है।
शिक्षा और समाज का संबंध परस्पर निर्भरता पर आधारित है। समाज अपनी आवश्यकताओं, मूल्यों और संरचना के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था का निर्माण करता है, वहीं शिक्षा समाज को दिशा, चेतना और निरंतरता प्रदान करती है। इस अंतर्संबंध में शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। समाजशास्त्र यह मानता है कि शिक्षक केवल पाठ्यवस्तु का संप्रेषक नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों, सांस्कृतिक विरासत और नैतिक मानकों का संवाहक होता है। जैसे-जैसे समाज में परिवर्तन आता है, वैसे-वैसे शिक्षक की भूमिका, अपेक्षाएँ और उत्तरदायित्व भी बदलते जाते हैं। परंपरागत भारतीय समाज में गुरु-शिष्य परंपरा के अंतर्गत शिक्षक का स्थान अत्यंत सम्मानजनक था। शिक्षा का उद्देश्य चरित्र निर्माण, आत्मानुशासन और सामाजिक स्थिरता था। किंतु औद्योगीकरण, शहरीकरण, वैश्वीकरण, लोकतंत्रीकरण और सूचना-प्रौद्योगिकी के विकास ने समाज की संरचना को बदल दिया। इन परिवर्तनों ने शिक्षा के उद्देश्यों को विस्तार दिया और शिक्षक की भूमिका को अधिक जटिल व बहुआयामी बना दिया।
शब्द कुंजी- शिक्षक, समाजशास्त्र,
सामाजिक परिवर्तन, शिक्षा व्यवस्था, नवीन शिक्षा नीति 2020।
