• January to March 2026 Article ID: NSS9573 Impact Factor:8.05 Cite Score:18 Download: 4 DOI: https://doi.org/ View PDf

    भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध

      बीरेंद्र सिंह कुशवाह
        सहायक प्राध्यापक (इतिहास) शास. महाविद्यालय, बदरवास, शिवपुरी (म.प्र.)

शोध सारांश-  प्रस्तुत शोधपत्र भारतीय ज्ञान परंपरा में गुरु-शिष्य सम्बन्ध के शाश्वत एवं पवित्र रूप को दर्शाता है।गुरु-शिष्य के बीच का सम्बन्ध न केवल एक शैक्षिक प्रक्रिया हैबल्कि यह एक सबंध से ऊपर उठकर सामाजिकधार्मिकदार्शनिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया है। भारतीय संस्कृति कहती है कि मानव जीवन का उद्देश्य आंतरिक और बाहरी अनुभव से विकसित होना है और शिष्यों के मन मस्तिष्क को विकसित करना ही एक गुरु का कर्तव्य भी है और धर्म भी। इस परिवर्तनकारी अनुभव को प्राप्त करने के क्रम में गुरु का एक विशेष स्थान है। गुरु-शिष्य का सम्बन्ध रिश्ते की दो मुख्य विशेषताओं जैसेशिष्य का समर्पण और गुरु के साथ घनिष्ठता पर निर्भर करता है। ऐसा माना जाता है कि वास्तविक शिक्षण तब होता है जब शिष्य खुद को अनुशासित कर लेता है और गुरु की तरंग दैर्ध्य के अनुरूप हो जाता है।यह शोधपत्र गुरु-शिष्य सम्बन्ध के बहुआयामी लाभों का विश्लेषण करता है। साथ ही इसके ऐतिहासिक विकासस्वरूपआदान-प्रदान की विधियाँनैतिक एवं आध्यात्मिक आयामतथा आधुनिक परिवर्तनों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

शब्द कुंजी-गुरु-शिष्यभारतीय ज्ञान परंपराशिष्यागमन।