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January to March 2026 Article ID: NSS9593 Impact Factor:8.05 Cite Score:15 Download: 3 DOI: https://doi.org/ View PDf
भारतीय ज्ञान परंपरा एवं संस्कृत साहित्य में विश्व कल्याण की भावना
डॉ. नलिनी तिलकर
सहायक प्राध्यापक एवं विभागाध्यक्ष (संस्कृत) PMCoE- शासकीय माधव महाविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.)
प्रस्तावना- भारतीय ज्ञान परंपरा में संस्कृत
साहित्य को केवल दार्शनिक चिन्तन या तर्क -वितर्क
का साधन नहीं माना गया,
बल्कि इसे विश्वशांति,
सह अस्तित्व और सार्वभौमिक कल्याणकारी जीवन-दृष्टि का संवाहक स्वीकार किया गया
है। प्राचीन ऋषियों ने अपने आत्मानुभव और तपोबल के आधार पर ऐसा ज्ञान संस्कार
निर्मित किया,
जो व्यक्तिगत मोक्ष तक सीमित न रहकर समस्त मानवता और जगत् की मंगलकामना करता
है। इसी कारण भारतीय साहित्य में “व्यक्ति”
और “विश्व” के बीच
किसी प्रकार का द्वंद्व नहीं,
बल्कि परस्पर पूरक और समन्वित संबंध दृष्टिगोचर होता है।
