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January to March 2026 Article ID: NSS9618 Impact Factor:8.05 Cite Score:126 Download: 13 DOI: https://doi.org/ View PDf
भारतीय ज्ञान परंपरा और पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य का दर्शन: एक युगांतरकारी विश्लेषण
डॉ. हर्षा त्रिवेदी
अध्येता, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला (हिमाचल प्रदेश)
प्रस्तावना- भारतीय ज्ञान परंपरा विश्व की वह प्राचीनतम जीवन पद्धति
है जो केवल सूचनाओं के संग्रह तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसने मानव चेतना के उच्चतम
शिखर को छूने का मार्ग प्रशस्त किया। इस परंपरा का मूल आधार 'सत्य' की खोज और 'लोक-कल्याण'
की भावना है। वेदों से लेकर उपनिषदों तक और दर्शन शास्त्रों से लेकर पुराणों तक, इस
ज्ञान का एक ही स्वर रहा है'एकम सद्विप्रा बहुधा वदन्ति'। बीसवीं शताब्दी के कालखंड
में जब भारतीय समाज पाश्चात्य भौतिकवाद और आंतरिक कुरीतियों के दोहरे दबाव में अपनी
जड़ों को भूल रहा था, तब पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य एक ऐसे मनीषी के रूप में उभरे
जिन्होंने इस प्राचीन ज्ञान परंपरा को आधुनिक तर्कसंगत और वैज्ञानिक ढांचे में ढालकर
पुनः जीवित किया। आचार्य जी का दर्शन किसी संकीर्ण संप्रदाय का पोषण नहीं करता, बल्कि
वह उस वैदिक ऋषि परंपरा का विस्तार है जो 'वसुधैव कुटुंबकम' के भाव को चरितार्थ करती
है। उनके अनुसार, भारतीय ज्ञान परंपरा का वास्तविक अर्थ केवल संस्कृत के श्लोकों का
पाठ करना नहीं है, बल्कि उन सिद्धांतों को जीवन में उतारना है जो मनुष्य को पशुत्व
से देवत्व की ओर ले जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय संस्कृति 'आत्मा' की
संस्कृति है, जिसमें पदार्थ और चेतना का अद्भुत संतुलन है। आचार्य जी ने अपने संपूर्ण
जीवन और साहित्य में इस बात पर बल दिया कि प्राचीन ऋषियों द्वारा प्रतिपादित 'यज्ञ'
और 'गायत्री' केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और आध्यात्मिक शोध की प्रक्रियाएं
हैं। उन्होंने 'वैज्ञानिक अध्यात्मवाद' की नींव रखी, जो इस धारणा को खंडित करती है
कि विज्ञान और धर्म परस्पर विरोधी हैं। उनके दर्शन में विज्ञान पदार्थ की शक्ति का
अन्वेषण है, तो अध्यात्म अंतरात्मा की शक्तियों का जागरण।
