• January to March 2026 Article ID: NSS9640 Impact Factor:8.05 Cite Score:29 Download: 6 DOI: https://doi.org/ View PDf

    डी.एल.एड. पाठ्यक्रम के प्रथम वर्ष अन्तर्गत कार्यानुभव शिक्षण के व्यावहारिक स्वरूप का अध्ययन

      डॉ. रश्मि शर्मा
        प्राचार्य, राष्ट्र भारती शिक्षा महाविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.)
      पवन कुमार सोपरा
        शोधार्थी, शिक्षाशास्त्र, सतत् शिक्षा अध्ययनशाला, सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन (म.प्र.)

शोध सारांश-  ‘‘मैंने साक्षर होने की सराहना कभी नहीं की, मेरे अनुभवों ने साबित किया है कि केवल साक्षर होना किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का संवर्धन नहीं कर सकता। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि शिक्षा के साथ कार्य को जोड़ा जाए। मेरे विचार से प्रारंभ से ही बच्चों को श्रम की गरिमा से परिचित कराया जाए।‘’  - महात्मा गाँधी

            किसी भी व्यावसायिक पाठ्यक्रम में व्यावहारिक (च्तंबजपबंस) अनुभव आवश्यक ही नहीं वरन् अनिवार्य है। कहा जाता है, श्स्मंतदपदह इल कवपदहश् अर्थात् कार्य करने के दौरान हुए अनुभव, स्मृति का अटूट हिस्सा बनकर अधिगम में परिणित हो जाते हैं। इस प्रकार से किया गया अधिगम अधिक आत्मविश्वास लेकर आता है तथा वह समाजोपयोगी और स्थायी होता है।

            भारत की शिक्षक शिक्षा में ‘‘बुनियादी शिक्षा’’ के रूप में कार्य से शिक्षा का अभिनव माॅडल विकसित हुआ है। समय के साथ-साथ गतिविधियों के स्वरूप में पर्याप्त बदलाव आया, किन्तु सैद्धान्तिक गतिविधियों के साथ-साथ व्यावहारिक गतिविधियों का आज भी उतना ही महत्व है। हालांकि इन अनेक व्यावहारिक गतिविधियों का सीमित संसाधनों के साथ समुचित सम्पादन कैसे हो यह एक चुनौती है और शिक्षक से जुड़े अधिकांश हितग्राही इसे महसूस भी करते हैं। प्रस्तुत शोध में इस दिशा में एक अभिनव प्रयास किया है।