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July to September 2025 Article ID: NSS9265 Impact Factor:8.05 Cite Score:21179 Download: 204 DOI: https://doi.org/10.63574/nss.9265 View PDf
कार्यस्थल पर लैंगिक समानता और मानवाधिकारः चुनौतियाँ, प्रगति और भविष्य का मार्ग
डॉ. नीता मौर्य
सहायक प्रोफेसर (समाजशास्त्र) श्री शिवा डिग्री महाविद्यालय तेरही कप्तानगंज आजमगढ़ (उ.प्र.)
शोध सारांश- कार्यस्थल पर लैंगिक समानता
केवल नैतिक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक मौलिक मानवाधिकार है। यह शोध पत्र कार्यस्थल में
लैंगिक समानता और मानवाधिकारों के अटूट संबंध का विश्लेषण करता है। इसमें व्यवस्थित
असमानताओं (वेतन अंतराल, भर्ती व पदोन्नति में पूर्वाग्रह, यौन उत्पीड़न), उनके मानवाधिकारों
पर प्रभाव (समानता, गरिमा, सुरक्षा, आजीविका का अधिकार), और वैश्विक व भारतीय कानूनी
ढांचों की समीक्षा शामिल है। साथ ही विविधता, समावेशन और सशक्तिकरण की रणनीतियों का
मूल्यांकन करता है तथा सुझाव देता है कि सही मायने में समावेशी कार्यस्थल केवल कानूनी
अनुपालन से नहीं, बल्कि संस्कृति, नेतृत्व प्रतिबद्धता और सामाजिक मानदंडों में परिवर्तन
से ही प्राप्त हो सकते हैं। निष्कर्षतः लैंगिक समानता किसी भी समाज की आर्थिक प्रगति
और मानवाधिकारों की सुरक्षा के लिए अनिवार्य है। भारत में मानवाधिकार कानून, मानवाधिकार
संरक्षण अधिनियम, 1993 द्वारा शासित होते हैं। यह अधिनियम, संविधान द्वारा गारंटीकृत
या अंतर्राष्ट्रीय संधियों में निहित और भारत में अदालतों द्वारा लागू किए जा सकने
वाले, जीवन, स्वतंत्रता, समानता और व्यक्ति की गरिमा से संबंधित अधिकारों को “मानवाधिकार“
के रूप में परिभाषित करता है।
शब्द कुंजी- लैंगिक असमानता, मानवाधिकार,
POSH.
