• October to December 2025 Article ID: NSS9535 Impact Factor:8.05 Cite Score:274 Download: 22 DOI: https://doi.org/ View PDf

    ऋग्वैदिक और उत्तर वैदिक काल में स्त्री: एक तुलनात्मक अध्ययन

      डॉ. सचिन कुमार
        एसोसिएट प्रोफेसर (इतिहास) डी0 ए0 वी0 कॉलेज, मुजफ्फरनगर (उ.प्र.)

शोध सारांश-  किसी भी समय का समाज रहा हो वह तब ही तक प्रगति करता है जब उसका समावेशी विकास होता है अर्थात जब उस समाज के पुरुष वर्ग और स्त्री वर्ग दोनों का शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक विकास होता है। पुरुष प्रधान समाज में सामान्यतः यह पाया गया है कि उनमें स्त्रियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं होती तथा वे हाशिए पर रहती है। वर्तमान हो या भूतकाल महिलाओं की दशा कमोबेश ऐसी ही रही है। वर्तमान में, भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहां स्त्री और पुरुष दोनों को संविधान समान अधिकार प्रदान करता है परंतु यह अधिकार संविधान और तमाम कानूनी किताबों के पन्नों तक ही सीमित होकर रह गए हैं। भारतीय समाज में अभी भी यह अधिकार जमीनी स्तर पर पूर्णतः व्यवहार में नहीं आ पा रहे हैं और यह तब है जब हमारा देश संवैधानिक लोकतांत्रिक गणराज्य है। इस स्थिति को ध्यान में रखते हुए हम अनुमान लगा सकते हैं कि आज से लगभग 3000 वर्ष पहले भारतीय समाज में महिलाओं की दशा का स्तर क्या रहा होगा ? हम अपने इस शोध पत्र में प्राचीन भारतीय इतिहास के वैदिक और उत्तर वैदिक काल के समाज में महिलाओं की स्थिति का उपलब्ध तथ्यों के आधार पर विश्लेषण कर एक चित्र खींचने का प्रयास करेंगे  जिससे इतिहास के विद्यार्थियों को तत्कालीन महिलाओं की वास्तविक दशा को समझने में मदद मिलेंगी। यह शोध पत्र दो प्रकार से तुलनात्मक अध्ययन करेगा पहला, शोध वर्तमान में पुरुष व स्त्री को प्राप्त अधिकारों के आधार पर व दूसरा, वैदिक काल से उत्तर वैदिक काल तक आते-आते स्त्रियों की स्थिति व अधिकारों में आ चुके बदलावों के आधार पर।

शब्द कुंजी-शिक्षा, समाज, अधिकार, धर्म, वैदिक काल, ऋग्वेद, स्त्री, पुरुष, उत्तर वैदिक काल।